डॉ० हरि नारायण
असिस्टेंट प्रोफेसर (सीनियर स्केल), दर्शनशास्त्र विभाग, बलि राम भगत कॉलेज, समस्तीपुर, बिहार
E-mail: harineelu1891@gmail.com
Issue: Vol. 2 No. 3 (September 2026) – Anubodhan
प्राप्तिः 12 सितम्बर 2026 / स्वीकृतः 23 सितम्बर 2026 / प्रकाशित ऑनलाइन: 24 सितम्बर 2026
DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.111
Abstract
भारतीय दार्शनिक परंपरा में योग दर्शन एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं व्यावहारिक दर्शन है, जिसका मुख्य उद्देश्य मानव को शारीरिक, मानसिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक स्तर पर पूर्णता की ओर अग्रसर करना है। महर्षि पतञ्जलि द्वारा प्रतिपादित योग दर्शन में ईश्वर की अवधारणा एक विशिष्ट स्थान रखती है। जहाँ सांख्य दर्शन सृष्टि की व्याख्या बिना ईश्वर के करता है, वहीं योग दर्शन ईश्वर को “पुरुषविशेष” के रूप में स्वीकार करता है। योग दर्शन में ईश्वर की स्वीकृति केवल दार्शनिक कल्पना नहीं है, बल्कि साधना की एक व्यावहारिक आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत की गई है। महर्षि पतञ्जलि ने ‘ईश्वर-प्रणिधान’ को समाधि प्राप्ति का प्रभावी साधन माना है। साधक के लिए ईश्वर श्रद्धा, विश्वास, समर्पण तथा मानसिक एकाग्रता का सर्वोच्च आधार बनता है। इस प्रकार योग दर्शन में ईश्वर की अवधारणा धार्मिक आस्था से अधिक मनोवैज्ञानिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक अनुशासन का आधार बन जाती है।
प्रस्तुत शोध-आलेख में पातञ्जल योग दर्शन में प्रतिपादित ईश्वर की अवधारणा का दार्शनिक विश्लेषण किया गया है। इसमें पतञ्जलि के योगसूत्र के आधार पर ईश्वर के स्वरूप, विशेषताओं, ईश्वर-प्रणिधान की उपयोगिता तथा समकालीन संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता का आलोचनात्मक विश्लेषण किया गया है। विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि योग दर्शन का ईश्वर न केवल आध्यात्मिक उन्नति का आधार है, बल्कि आधुनिक तनावग्रस्त जीवन में मानसिक संतुलन एवं नैतिक विकास का भी प्रभावी माध्यम सिद्ध हो सकता है।
मुख्य शब्द: योग दर्शन, ईश्वर, पतञ्जलि, पुरुषविशेष, ईश्वर-प्रणिधान, समाधि।
How to cite: Narayan, H. (2026). पातञ्जल योग दर्शन में ईश्वर की अवधारणा: एक दार्शनिक विश्लेषण. Anubodhan, 2(3), 185–190. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.111