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जयशंकर प्रसाद का नाट्य-दर्शन और छायावादी सौन्दर्य-चेतना

मलय गोप 1, प्रो० रवि रंजन कुमार 2

1   शोधार्थी, हिन्दी विभाग, नागालैंड विश्वविद्यालय, कोहिमा, नागालैंड

Corresponding author: मलय गोप,   E-mail: malaygope1995@gmail.com  

2   प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, नागालैंड विश्वविद्यालय, कोहिमा, नागालैंड

Issue: Vol. 2 No. 3 (September 2026) – Anubodhan

प्राप्तिः 13 सितम्बर 2026 / संशोधित: 15 सितम्बर 2026  / स्वीकृतः 19 सितम्बर 2026 / प्रकाशित ऑनलाइन: 21 सितम्बर 2026

DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.110

Abstract

प्रस्तुत शोध आलेख में जयशंकर प्रसाद के नाट्य-दर्शन और उनकी छायावादी सौन्दर्य-चेतना का समग्र विवेचन किया गया है। प्रसाद ने हिंदी नाटक को पारसी रंगमंच की मनोरंजन प्रधान परंपरा से आगे ले जाकर इतिहास, संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना, दर्शन और काव्यात्मकता से समृद्ध किया। प्रस्तुत अध्ययन में ‘स्कंदगुप्त’, ‘चंद्रगुप्त’, ‘ध्रुवस्वामिनी’, ‘विशाख’, ‘कामना’, ‘एक घूँट’ तथा ‘जनमेजय का नागयज्ञ’ आदि नाटकों के आधार पर प्रसाद की नाट्य-दृष्टि का विश्लेषण किया गया है। उनके नाट्य-साहित्य में काव्यात्मक भाषा, गद्य-गीत शैली, भावात्मक संवाद, प्रतीकात्मक चरित्र-योजना और स्वच्छंद नाट्य-शिल्प प्रमुख विशेषताओं के रूप में उभरते हैं। प्रसाद का नाट्य-दर्शन बुद्ध की करुणा, शैवागम, निष्काम कर्म, मानवतावाद, प्रेम, अहिंसा और जीवन-संतुलन जैसे मूल्यों पर आधारित है। उनकी छायावादी सौन्दर्य-चेतना बाह्य सौन्दर्य के बजाय अंतर्मन की वेदना, स्वानुभूति, प्रकृति, प्रेम और आध्यात्मिक संवेदना को महत्त्व देती है। वे यथार्थवाद और आदर्शवाद के बीच समन्वय स्थापित करते हुए साहित्य को सामाजिक चेतना और मानवीय मुक्ति का माध्यम मानते हैं। इस प्रकार प्रसाद का नाट्य-साहित्य परंपरा और प्रयोग, इतिहास और वर्तमान, काव्य और रंगमंच तथा व्यक्ति और समाज के मध्य रचनात्मक संवाद स्थापित करता है।

बीज शब्द: नाट्य-दर्शन; सौन्दर्य-चेतना; काव्यात्मकता; स्वच्छंद नाट्य-शैली; मानवतावाद; करुणा; गद्य-गीत; रंग-दृष्टि।

How to cite: Gope, M. & Kumar, R. R. (2026). जयशंकर प्रसाद का नाट्य-दर्शन और छायावादी सौन्दर्य-चेतना. Anubodhan, 2(3), 177–184. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.110

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