डॉ० शुचि तिवारी
सहायक प्राध्यापक, दर्शनशास्त्र विभाग, जी० जे० कॉलेज, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना, बिहार
E-mail: shuchi.tiwari27@gmail.com
Issue: Vol. 2 No. 3 (September 2026) – Anubodhan
प्राप्तिः 12 सितम्बर 2026 / संशोधित: 17 सितम्बर 2026 / स्वीकृतः 19 सितम्बर 2026 / प्रकाशित ऑनलाइन: 29 सितम्बर 2026
DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.120
Abstract
‘अशुभ’ दर्शनशास्त्र की एक महत्वपूर्ण समस्या है, जिसका संबंध दुःख, अभाव, पीड़ा, अनैतिकता तथा मानवीय जीवन की विसंगतियों से है। प्रस्तुत आलेख में ‘शुभ’ और ‘अशुभ’ की अवधारणाओं का भारतीय एवं पाश्चात्य दार्शनिक दृष्टिकोणों से विवेचन किया गया है। सुकरात, काण्ट, जी. ई. मूर, ऑगस्टाइन तथा विशेष रूप से श्री अरविन्द के विचारों के आधार पर अशुभ की प्रकृति, उत्पत्ति और प्रयोजन को समझने का प्रयास किया गया है। आलेख में प्राकृतिक एवं नैतिक अशुभ के स्वरूप तथा उनके पारस्परिक संबंधों का भी विश्लेषण किया गया है। श्री अरविन्द के अनुसार अशुभ को मानव की सीमित दृष्टि और चेतना के अपूर्ण विकास के संदर्भ में समझा जा सकता है; विकास की उच्चतर अवस्था में यही अशुभ शुभ में रूपांतरित होने की संभावना रखता है। निष्कर्षतः अशुभ केवल नकारात्मक सत्ता नहीं, बल्कि मानव चेतना, नैतिकता और आध्यात्मिक विकास से जुड़ी एक जटिल दार्शनिक समस्या है।
प्रमुख शब्द: अशुभ, शुभ, प्राकृतिक अशुभ, नैतिक अशुभ, नैतिकता, श्री अरविन्द, मानव चेतना।
How to cite: Tiwari, S. (2026). अशुभ : एक दृष्टिकोण. Anubodhan, 2(3), 258–261. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.120