हिमांशु
शोध छात्र, अनुप्रयुक्त दर्शनशास्त्र विभाग, महात्मा ज्योतिबा फुले रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली, उत्तर प्रदेश, भारत
E-mail: himanshujaiswal311@gmail.com
Issue: Vol. 2 No. 3 (September 2026) – Anubodhan
प्राप्तिः 22 सितम्बर 2026 / संशोधित: 25 सितम्बर 2026 / स्वीकृतः 30 सितम्बर 2026 / प्रकाशित: 30 सितम्बर 2026
DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.133
Abstract
‘वसुधैव कुटुम्बकम’ भारतीय वैदिक-उपनिषद् परम्परा की ऐसी विश्वदृष्टि है, जो मानव-जीवन को संकीर्ण स्वार्थ, जातीय सीमाओं, राष्ट्रीय अहंकार और उपभोगवादी प्रवृत्तियों से ऊपर उठाकर समस्त पृथ्वी को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देती है। यह विचार केवल आध्यात्मिक आदर्श नहीं है, बल्कि मानव, प्रकृति, समाज और ब्रह्मांड के बीच अंतर्संबंधों की गहरी दार्शनिक समझ पर आधारित है। वैदिक ऋषियों ने जीवन को खंडों में नहीं, बल्कि समग्रता में देखा। उनके चिंतन में पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, वनस्पति, पशु, मानव और देवत्व एक व्यापक ब्रह्मांडीय व्यवस्था के अंग हैं। इसी व्यवस्था को वैदिक साहित्य में ‘ऋत’ कहा गया है, जो प्राकृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक संतुलन का आधार है। वर्तमान युग में जब मानव सभ्यता जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय असंतुलन, आर्थिक विषमता, युद्ध, विस्थापन, संसाधनों के अंधाधुंध दोहन और सामाजिक विभाजन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ सतत विकास के लिए एक वैकल्पिक दार्शनिक प्रतिमान प्रस्तुत करता है।
मुख्य शब्द: वसुधैव कुटुम्बकम, वैदिक ऋषि परम्परा, सतत विकास, ऋत, धर्म, यज्ञ, पर्यावरणीय नैतिकता, वैश्विक परिवार।
How to cite: Himanshu. (2026). वैदिक ऋषि परम्परा में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’: सतत विकास हेतु एक दार्शनिक प्रतिमान. Anubodhan, 2(3), 369–375. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.133