डॉ. प्रीति शुक्ला
रामनगर, वाराणसी
ई-मेल: pritishukla444@gmail.com
Issue: Volume 2 No. 2 (June 2026) Anubodhan
प्राप्तिः 9 अप्रैल 2026 / संशोधित: 11 अप्रैल 2026 / स्वीकृतः 12 अप्रैल 2026 / प्रकाशित ऑनलाइन: 21 अप्रैल 2026
DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.053
Abstract
साहित्य का अस्तित्व मानव जीवन में उस दीप्तिमान ज्योति के समान है जो कि किंकर्तव्यता की स्थिति में “किं करणीयम् वा किं अकरणीयम्” के द्वन्द में फँसे मनुष्य के पथप्रदर्शन का कार्य करती है। विशेषतः संस्कृत साहित्य का अथाह भण्डार अनेकों ऐसे ग्रन्थों रूपी रत्नों से भरा हुआ है जो मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष का निदर्शन करते हैं। आदिकवि वाल्मीकि, महाकवि कालिदास, भारवि, माघ, दण्डी आदि अनेकों आचार्यों ने अपनी अपनी रचनाओं के माध्यम से संस्कृत साहित्य के इस विशाल कोशागार का मानव सभ्यता के हितसाधन के लिए निरन्तर अभिवर्धन किया है। इन्हीं कवियों में अन्यतम संस्कृत साहित्य के महान कवि एवं आचार्य भवभूति का नाम अन्यतम है जिनकी रचना “उत्तररामचरितम्” है। यद्यपि भवभूति ने तीन नाट्य ग्रन्थों का प्रणयन किया है, परन्तु उनकी कीर्ति का प्रमुख आधार स्तम्भ “उत्तररामचरितम्” ही है। ऐसा मत संस्कृत सहित्य जगत में प्रचलित है। प्रस्तुत शोधपत्र में इसी मत की तर्कसंगतता का समीक्षात्मक वर्णन किया गया है।
बीज शब्द : उत्तररामचरितम्, भवभूति
How to cite: Shukla, P. (2026). उत्तररामचरितम् भवभूर्तिविशिष्यते : एक समीक्षात्मक अध्ययन. Anubodhan, 2(2), 9–12. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.053