अनन्त कुमार
शोधार्थी, वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर, E-mail: anantkummartiwari@gmail.com
Issue: Volume 1 No. 4 (December 2025) Anubodhan
Published: 31 December 2025
Abstract
स्वामी विवेकानंद जी का स्पष्ट मत है कि ज्ञान बाहर से नहीं आता बल्कि वह तो मनुष्य के भीतर ही होता है। इस अंतर निहित ज्ञान अथवा पूर्णता की अभिव्यक्ति करना ही शिक्षा है। लौकिक तथा आध्यात्मिक सभी प्रकार का ज्ञान मनुष्य के मन में पहले से ही विद्यमान रहता है। अतः शिक्षा को मनुष्य के अंदर निहित ज्ञान अथवा पूर्णता की अभिव्यक्ति करनी चाहिए।
विवेकानंद जी के अनुसार भारत के पिछड़े पान का सबसे बड़ा कारण उसका बौद्धिक पिछलापन नहीं है और इस कमी को दूर करने के लिए बालकों का मानसिक तथा बौद्धिक विकास किया जाए ताकि वह अपने पैरों पर खड़े हो सके और जीवन की चुनौतियों का बहादुरी से सामना कर सकें।
स्वामी जी के अनुसार सभी प्रकार के क्रियाकलाप एवं सभी प्रकार के आयोजन या प्रबंधन या नीति निर्माण का मूल उद्देश्य मनुष्य को मानवता की शिक्षा देना ही है ताकि वह अपने साथ-साथ अपने परिवार समाज राष्ट्र एवं विश्व के लिए कल्याणकारी हो सके अर्थात शिक्षा का मूल उद्देश्य मनुष्य का निर्माण करना है।
स्वामी जी का स्पष्ट मत है कि मानसिक एवं शारीरिक विकास के साथ-साथ व्यक्ति का चरित्र उच्च कोटि का होना चाहिए तभी वह समाज में एवं स्वयं के भीतर भी सच्चा बदलाव ला सकता है । वह स्वयं कहते हैं कि “हमें उस शिक्षा की आवश्यकता है जिसके द्वारा चरित्र का निर्माण होता है मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती है बुद्धि का विकास होता है और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है।”
महात्मा गांधी भी बलपूर्वक कहते हैं कि “सच्ची शिक्षा वह है जो स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त करती है। केवल वही उच्च शिक्षा है जो हमें अपने धर्म का संरक्षण करने के लिए समर्थ बनती है । पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृत के अंधा अनुकरण के कारण भारतीय शिक्षा में विदेशी पान का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है। एसएससी भारत का उत्थान संभव नहीं है। मां-बाप आचार्य सब ने प्राचीन आदर्श और मूल्यों का परित्याग कर दिया है जिसकी कारण विद्यार्थियों में भी मूल्य बोध का ह्रास हुआ है।”
How to Cite: Kumar, Anant (2025). स्वामी विवेकानंद जी के शिक्षा संबंधी विचारों का अध्ययन. Anubodhan, 1(4), 49–61. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v1n4.2025.030