मनोज कुमार मिश्रा 1 & डॉ० हितेश कुमार सिंह 2
1 शोध छात्र, दर्शनशास्त्र विभाग, मेरठ कॉलेज, मेरठ, उत्तर प्रदेश
2 असिस्टेंट प्रोफेसर, दर्शनशास्त्र विभाग, मेरठ कॉलेज, मेरठ, उत्तर प्रदेश
E-mail: 25mishramanoj@gmail.com
Issue: Vol. 2 No. 3 (September 2026) – Anubodhan
प्राप्तिः 29 जुलाई 2026 / संशोधित: 4 अगस्त 2026 स्वीकृतः 5 अगस्त 2026 / प्रकाशित ऑनलाइन: 8 अगस्त 2026
DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.095
Abstract
प्रस्तुत शोध पत्र में कश्मीर शैव दर्शन (त्रिक एवं कौल मत) के दो सर्वप्रमुख प्रमाणित ग्रन्थों- आचार्य अभिनवगुप्तकृत ‘श्रीतन्त्रालोकाः‘ (21वां आहनिक) एवं आगम शिरोमणि ’विज्ञान भैरव’ तन्त्र के आलोक में मानव शरीर की मूल काम-ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन, धारणा और तान्त्रिक ‘यामल संघट्ट‘ विधि का विस्तृत मीमांसात्मक विश्लेषण किया गया है। शोध की मौलिकता को पुख्ता करने हेतु आधुनिक पाश्चात्य मनोविश्लेषणवाद (सिगमंड फ्रायड के लिबिडो सिद्धांत एवं विलहेम रीच के ओर्गन ऊर्जा विज्ञान) के साथ इसका एक गंभीर तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। यह लेख प्रमाणित करता है कि काम-ऊर्जा का जैविक विसर्जन और स्खलन जीव को पशुत्व के पाश में बांधता है, जबकि तन्त्र की -संक्षोभ-विगम‘ और ‘बिन्दु-धारण‘ की प्रयोगात्मक विधि काम के क्षणिक सुख को साक्षात नित्य शाम्भवी विश्रान्ति और शाश्वत ब्रहम आनंद में रुपांतरित करने का परमोच्च वैज्ञानिक मार्ग है।
बीज शब्दः तन्त्रालोक, विज्ञान भैरव, यामल संघट्ट, लिबिडो, ओर्गन ऊर्जा, बिंदु-धारण, संक्षोभ-विगम, ऊर्ध्वरिता
How to cite: Mishra, M. K. & Singh, H. K. (2026). श्रीतन्त्रालोक के आलोक में यामल संघट्ट एवं काम ऊर्जा का आध्यात्मिक रुपान्तरण: एक अनुशीलन. Anubodhan, 2(3), 34–37. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.095