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ANUBODHAN

A Peer Reviewed Multidisciplinary Quarterly Research Journal

ॐकार उपासना में मानव चेतना की उपादेयता : एक अध्ययन

डॉ.  प्रवीण कुमार गुप्त

सहायक आचार्य, योग विभाग, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक

Abstract

संसार में व्याप्त अनेक जीवों में से केवल मानव ही एक जीव है जो अपने लक्ष्य को समझकर उसे पाने के लिए प्रयास कर सकने में सक्षम है। मानव के अतिरिक्त अन्य प्राणी की क्षमता केवल पेट पालने, प्रजनन करने तक ही सीमित है। जबकि मानव की क्षमताए असीम है, वह समझने, चिंतन करने, मूल्यांकन करने तथा अनगिनित उपलब्धियों को प्राप्त करने की सामर्थ्य को स्वयं के भीतर रखता है। इन सभी सामर्थ्य का मानव के पास होने का श्रेय मानव के चेतना को जाता है। भारतीय प्राचीन ग्रंथ वेदों, दर्शनों, स्मृतियों, पुराणों तथा उपनिषदों में मुक्त कंठ से चेतना को जाग्रम करने, उन्नत बनाने को कहा है तथा चेतना को सार रूप में अध्यात्म का विज्ञान के रूप में परिभाषित किया है तथा इस अध्यात्मिक उत्कर्ष के मार्ग पर प्रशस्त होने के लिए प्रयुक्त होने वाले उपायों श्रद्धा, भक्ति, आरती, आसन, योग में से एक सुगम उपाय ॐकार की उपासना के रूप में उभरकर आता है। ॐकार ईश्वर का ही अन्य नाम अर्थात प्रणव को कहा जाता है। प्रणव एक अनाहत नाद है, जिसकी वर्णात्मक अभिव्यक्ति ओम है। विभिन्न ग्रंथों में प्रणवोपासना के सांसारिक तथा आध्यात्मिक लाभों का वर्णन है जिनमें चेतना का उत्थान प्रमुख लाभ है। मानव चेतना को विकसित करने में प्रणवोपसना एक अहम भूमिका का निर्वहन करता है, इन दोनों का संबध अविच्छिन्न है।1

कुंजी शब्द : ॐकार,नाङीशोधन प्राणायाम, प्राणायाम, ध्यान, मानसिक स्वास्थ्य

How to Cite: Gupta, P. K. (2025). ॐकार उपासना में मानव चेतना की उपादेयता : एक अध्ययन. Anubodhan, 1(3), 69–77.

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