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ANUBODHAN

A Peer Reviewed Multidisciplinary Quarterly Research Journal

मनुस्मृति और श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित वर्णव्यवस्था का तुलनात्मक अध्ययन

मधुरिमा प्रियंवदा

शोध छात्रा, विश्वविद्यालय इतिहास विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार

E-mail: mp.del.chess@gmail.com

IssueVolume 2 No. 2 (June 2026) Anubodhan

प्राप्तिः 8 जून 2026 / स्वीकृतः 13 जून 2026 / प्रकाशित ऑनलाइन: 26 जून 2026

DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.062

Abstract

यह पाठ भारतीय समाज की वर्ण व्यवस्था के ऐतिहासिक, दार्शनिक और सामाजिक विकास का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। प्रारंभ में वर्ण व्यवस्था गुण और कर्म पर आधारित एक कार्य-विभाजन प्रणाली थी, जिसका उल्लेख ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में प्रतीकात्मक रूप से मिलता है, जहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को मानव शरीर के विभिन्न अंगों से उत्पन्न बताया गया है। इस रूपक का उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों की परस्पर उपयोगिता और महत्व को दर्शाना था, न कि किसी प्रकार की श्रेष्ठता या हीनता स्थापित करना। समय के साथ, विशेषकर मनुस्मृति के आगमन के बाद, यह व्यवस्था कठोर और जन्म-आधारित हो गई, जिससे सामाजिक असमानता को बढ़ावा मिला। मनुस्मृति में प्रत्येक वर्ण के कर्तव्यों को निश्चित कर दिया गया और वर्ण परिवर्तन की संभावना समाप्त हो गई। इसके विपरीत, भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने वर्ण व्यवस्था को पुनः गुण और कर्म के आधार पर परिभाषित किया तथा उसे नैतिकता और कर्तव्य से जोड़ा। इस प्रकार, गीता का दृष्टिकोण अधिक समन्वयवादी और व्यावहारिक है, जो व्यक्ति को अपने स्वधर्म के पालन की प्रेरणा देता है। अंततः, यह स्पष्ट होता है कि वर्ण व्यवस्था का मूल स्वरूप लचीला और कार्य-आधारित था, जो समय के साथ विकृत होकर सामाजिक विषमता का कारण बना, जबकि गीता ने उसके मूल तत्त्वों को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया।

बीज शब्द:  वर्ण व्यवस्था, कर्म विभाग, भगवद्गीता, मनुस्मृति, जातियों की उत्पत्ति

How to cite: Priyamvada, M. (2026). मनुस्मृति और श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित वर्णव्यवस्था का तुलनात्मक अध्ययन. Anubodhan, 2(2), 67–72. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.062

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