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ANUBODHAN

A Peer Reviewed Multidisciplinary Quarterly Research Journal

मानव स्वातंत्र्य: जे. कृष्णमूर्ति और जे. पी. सार्त्र

डॉ. हरि नारायण

सहायक आचार्य, दर्शनशास्त्र विभाग, बलि राम भगत महाविद्यालय,  समस्तीपुर, बिहार

Abstract

प्राचीन काल से ही मनुष्य की स्वतंत्रता को लेकर दो परस्पर विरोधी विचारधाराएं चलती आ रही हैं। एक विचारधारा का यह मानना है कि मनुष्य में इच्छा स्वातंत्र्य है अर्थात वह अपने कार्यों को करने में पूर्ण स्वतंत्र है, लेकिन दूसरी विचारधारा मानती है कि मनुष्य स्वतंत्र नहीं है और बाह्य परिस्थितियों से परिचालित होता रहता है। वैसे मनुष्य खुद को प्रायः बंधनों में ही पाता है और इन बंधनों में जीते हुए वह स्वतंत्रता की आकांक्षा करता रहता है। क्या मनुष्य का अस्तित्व स्वतंत्र है या वह बंधनों में जीने के लिए अभिशप्त है? यदि उसका अस्तित्व स्वतंत्र है, तो फिर उसकी वर्तमान अवस्था बंधनों में क्यों जकड़ी है? वह विभिन्न नियमों, नैतिक मानदंडों, परंपराओं, ईश्वर आदि का सहारा क्यों खोजता रहता है? ये सभी मानव अस्तित्व से जुड़े हुए बुनियादी प्रश्न हैं। 20वीं सदी के प्रख्यात भारतीय आध्यात्मिक मनीषी जे. कृष्णमूर्ति मानव अस्तित्व की प्रकृति, उसके होने के ढंग का अत्यंत सूक्ष्मता से अवलोकन करते हैं और वास्तविक स्वतंत्रता के आयाम को उद्घाटित करते हैं। 20वीं सदी के ही फ्रांस के प्रसिद्ध अस्तित्ववादी दार्शनिक जे. पी. सार्त्र भी इन प्रश्नों पर विचार करते हैं और मानव अस्तित्व को पूर्ण रूप से स्वतंत्र बताते हैं। अस्तित्ववाद आधुनिक काल की एक बहुत ही महत्वपूर्ण दार्शनिक विचारधारा है जिसमें मनुष्य की स्वतंत्रता पर अत्यधिक बल दिया गया है। प्रस्तुत शोध पत्र में इन दोनों प्रसिद्ध विचारकों की दृष्टि के आलोक में मानव स्वतंत्रता के विविध आयामों के विवेचन का प्रयास किया गया है।

प्रमुख शब्द: अस्तित्ववाद, स्वातंत्र्य, सार, स्वचेतन, आत्म-प्रवंचना, संस्कारबद्धता, प्रज्ञा का जागरण।

How to Cite: Narayan, H. (2025). मानव स्वातंत्र्य : जे.कृष्णमूर्ति और जे. पी. सार्त्र. Anubodhan, 1(3), 78–85.

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