डॉ० सम्राट चौधरी
एम. ए., पीएच. डी. (कथक), अतिथि व्याख्याता, वीरागंना मासक देवी नाग शासकीय आदर्श महाविद्यालय, दंतेवाड़ा (छ.ग.)
E-mail: joy24samrat@gmail.com
Issue: Vol. 2 No. 3 (September 2026) – Anubodhan
प्राप्तिः 2 जुलाई 2026 / संशोधित: 8 जुलाई 2026 / स्वीकृतः 13 जुलाई 2026 / प्रकाशित ऑनलाइन: 23 जुलाई 2026
DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.091
Abstract
कथक के नृत्तांग मंे बोल-बन्दिशों की श्रृंखला में परमेलु एक अनोखी रचना के रूप में अलग पहचान रखती है। लय-ताल छंद में निबद्ध शुद्ध ताल पक्ष की रचना होते हुए भी इसकी सुन्दरता व विशेषता इसकी रचनाशैली से है। एक ही बन्दिश में भिन्न -भिन्न बोलों का, प्राकृतिक ध्वनियों का प्रयोग एवं सम्मिश्रण से यह रचना लयात्मक, ध्वन्यात्मक एवं सौन्दर्यात्मक भी है। परमेलु का साधारण अर्थ भिन्न-भिन्न बोलों का परस्पर मिलित रूप से है, परमेलु यानि सुगन्ध जैसे किसी गुलदस्ता को जब सजाया जाता है तो इसमें अलग-अलग रंगीन खुशबूदार फूलों को व्यवस्थित रूप से पिरोया जाता है। जिससे उस गुलदस्ता की खुबसुरती बढ़़ जाती है। सदियों से गुरूजनों का इस प्रकार के रचना के पीछे उनके कलात्मक दृष्टिकोण, सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति, नृत्य में भी अनुरूप भावों को मूर्त करना आदि कथक परम्परा को निरंतर समृद्ध किया।
मुख्य शब्दः परमेलु, कथक नृत्य, प्राकृतिक ध्वनि, वाद्ययंत्र, सौन्दर्य, भाव, गति, नृत्तांग।
How to cite: Choudhury, S. (2026). कथक नृत्य में परमेलुः लय, ताल, छंद, वाद्ययंत्रों, नृत्य के बोल और प्रकृति की ध्वनियों का एक सुन्दर संयोजन. Anubodhan, 2(3), 7–10. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.091