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ANUBODHAN

A Peer Reviewed Multidisciplinary Quarterly Research Journal

जीवन का समग्र बोध : जे. कृष्णमूर्ति की अंतर्दृष्टि के आलोक में

डॉ० हरि नारायण

असिस्टेंट प्रोफेसर (सीनियर स्केल), दर्शनशास्त्र विभाग, बलि राम भगत कॉलेज, समस्तीपुर, बिहार

E-mail: harineelu1891@gmail.com

IssueVolume 2 No. 2 (June 2026) Anubodhan

प्राप्तिः 19 मई 2026 / संशोधित: 14 जून 2026 / स्वीकृतः 14 जून 2026 / प्रकाशित ऑनलाइन: 16 जून 2026

DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.061

Abstract

जे. कृष्णमूर्ति का दर्शन आधुनिक युग में मानव-चेतना, आत्मबोध और जीवन की समग्रता को समझने की एक विशिष्ट अंतर्दृष्टि प्रस्तुत करता है। उनका चिंतन किसी परंपरागत दार्शनिक प्रणाली, धार्मिक संप्रदाय अथवा वैचारिक अनुशासन से बँधा हुआ नहीं है, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव, जागरूकता और आत्म-अवलोकन पर आधारित है। “जीवन का समग्र बोध” उनके दर्शन का केंद्रीय तत्व है, जिसके माध्यम से वे मनुष्य को विभाजित चेतना से मुक्त होकर जीवन को उसकी पूर्णता में देखने की प्रेरणा देते हैं। कृष्णमूर्ति के अनुसार मनुष्य का जीवन भय, स्मृति, तुलना, प्रतिस्पर्धा और मनोवैज्ञानिक संघर्षों के कारण खंडित हो गया है। यह विभाजन व्यक्ति को स्वयं से, समाज से और प्रकृति से अलगाव की स्थिति में ले जाता है। कृष्णमूर्ति मानते हैं कि जीवन को समझने के लिए किसी बाह्य प्राधिकार, गुरु, धर्मग्रंथ अथवा विचारधारा पर निर्भर रहना आवश्यक नहीं है। इस निर्भरता से जीवन का समग्र बोध संभव नहीं है। उनके अनुसार सत्य किसी निश्चित पद्धति या अनुकरण से प्राप्त नहीं किया जा सकता, बल्कि वह तभी संभव है जब व्यक्ति अपने भीतर की गतिविधियों को निष्पक्ष रूप से अर्थात चुनाव रहित होकर देख सके। यह ‘देखना’ (चुनावरहित सजगता) ही अंतर्दृष्टि (Insight) है, जो विचार की सीमाओं से परे जाकर जीवन के वास्तविक स्वरूप का उद्घाटन करती है।

     समग्र बोध का अर्थ कृष्णमूर्ति के दर्शन में जीवन के सभी आयामों—व्यक्तिगत, सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक—को एक साथ समझना है। वे चेतना की ऐसी अवस्था की चर्चा करते हैं जिसमें मन किसी पूर्वाग्रह, भय या स्मृति के दबाव से मुक्त होकर वर्तमान क्षण को पूर्ण सजगता के साथ ग्रहण करता है। इस अवस्था में व्यक्ति के भीतर प्रेम, करुणा,शांति और स्वतंत्रता का विकास सहज ही होता है। इस तरह, कृष्णमूर्ति जीवन को तभी पवित्र, सार्थक और समग्र मानते हैं जब इसे जागरूकता, स्वतंत्रता और स्पष्टता के साथ जिया जाये। कृष्णमूर्ति के अनुसार जब मन विभाजन से मुक्त होता है, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होता है।

     यह शोध आलेख इस तथ्य को रेखांकित करता है कि कृष्णमूर्ति का समग्र जीवन-दर्शन केवल दार्शनिक विमर्श नहीं, बल्कि मानव जीवन के वास्तविक रूपांतरण का आधार है। उनका चिंतन आधुनिक समाज में बढ़ती मानसिक अशांति, हिंसा और अस्तित्वगत संकट के समाधान की दिशा में गहन प्रासंगिकता रखता है। इस प्रकार कृष्णमूर्ति की जीवन के समग्र बोध की अवधारणा मानव चेतना के विकास और आंतरिक स्वतंत्रता की दिशा में एक रूपांतरणकारी अंतर्दृष्टि प्रदान करती है।

मुख्य शब्द: समग्र बोध, अंतर्दृष्टि, चेतना, आत्म-अवलोकन, स्वतंत्रता, चुनावरहित सजगता, संस्कारबद्धता।

How to cite: Narayan, H. (2026). जीवन का समग्र बोध : जे. कृष्णमूर्ति की अंतर्दृष्टि के आलोक में. Anubodhan, 2(2), 62–66. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.061

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