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ANUBODHAN

A Peer Reviewed Multidisciplinary Quarterly Research Journal

हिन्दी साहित्य तथा भारतीय ज्ञान परम्परा में जीवन मूल्य

डॉ०  संजीव कुमार

सहायक प्राध्यापक (हिन्दी), हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, क्षेत्रीय केंद्र,   धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश, E-mail: sanju26971@gmail.com

Issue: Volume 1 No. 4 (December 2025) Anubodhan

Published: 31 December 2025

Abstract

‘ज्ञान’ शब्द व्यापक है। इसका अर्थ केवल जानकारी या तथ्यों का संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि इसमें समझ, जागरूकता और अनुभव भी शामिल है। ज्ञान हमें दुनिया को समझने और उसके अनुसार कार्य करने में मदद करता है। भगवद गीता में श्री कृष्ण ने ज्ञान के महत्व को स्पष्ट रूप से बताया है। उन्होंने ज्ञान को आत्मा की सच्चाई और संसार की वास्तविकता को समझने का माध्यम बताया। श्री कृष्ण ने ज्ञान का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा “जो व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्तर पर एकत्व को महसूस करता है, वही सच्चा ज्ञानी है।” अन्य शब्दों में, अपेक्षा रहित सत्य की स्वयं अनुभूति करना ही ज्ञान है।

     भाषा मानव सभ्यता तथा संस्कृति की विरासत का महत्त्वपूर्ण अंग है, उसकी पहचान है। मानव हृदय के भावों तथा विचारों को अभिव्यक्त करने का माध्यम भाषा कहलाता है। भारत जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में प्रथम स्थान पर तथा क्षेत्रफल की दृष्टि से सातवें स्थान पर है। भारत विविधताओं से परिपूर्ण देश है जिसमें अनेक धर्मों, वर्गों, सम्प्रदायों तथा जातियों के लोग रहते हैं। भारतीय भाषाओं के सन्दर्भ में संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्णित 22 भाषाएँ मान्यता प्राप्त हैं। हिन्दी भाषा भारत में सर्वाधिक बोली, लिखी, पढ़ी तथा समझी जाने वाली भाषा है। भारतीय संविधान की धारा 343 (1) के अनुसार भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी एवं लिपि देवनागरी है। संविधान की धारा 120 के अनुसार संसद का कार्य हिन्दी या अंग्रेजी में किया जाता है। हिन्दी भाषा भारत की सामरिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय एकता का आधार है। 

     “साहित्य” शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द “लिटेरा” से हुई है, जिसका अर्थ है “वर्णमाला का एक अक्षर”। साहित्य का अंग्रेजी पर्याय शब्द ‘लिटरेचर’ है। साधारण शब्दों में, जो समाज के हित के साथ लिपिबद्ध हो अर्थात् जिसमें समाज सहित होने का भाव हो, वह साहित्य कहलाता है। रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, “जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्त-वृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता है।”

बीज शब्द: हिन्दी साहित्य, भारतीय, ज्ञान, परम्परा, जीवन मूल्य

How to cite: Kumar, S. (2025). हिन्दी साहित्य तथा भारतीय ज्ञान परम्परा में जीवन मूल्य. Anubodhan, 1(4), 71–82. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v1n4.2025.032

DOI: 10.65885/anubodhan.v1n4.2025.032

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