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ANUBODHAN

A Peer Reviewed Multidisciplinary Quarterly Research Journal

भारतीय दर्शन में कर्म की अवधारणा

डॉ० कमलेश कुमार सिंह

सहायक प्राध्यापक, दर्शनशास्त्र विभाग, बी॰ एम॰ डी॰ कॉलेज, दयालपुर, वैशाली (बिहार)

E-mail: singhk280@gmail.com

IssueVolume 2 No. 2 (June 2026) Anubodhan

प्राप्तिः 28 मई 2026 / संशोधित: 4 जून 2026 / स्वीकृतः 5 जून 2026 / प्रकाशित ऑनलाइन: 12 जून 2026

DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.059

Abstract

भारतीय दर्शन में कर्म की अवधारणा मानव जीवन, नैतिकता और आध्यात्मिक विकास से संबंधित है। भारतीय दार्शनिक परम्परा में कर्म को केवल भौतिक क्रिया के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य के संकल्प, विचार, वाणी और व्यवहार से उत्पन्न नैतिक परिणामों के रूप में समझा गया है। कर्म का सिद्धान्त इस विश्वास पर आधारित है कि प्रत्येक कर्म का एक निश्चित फल होता है जो वर्तमान या भविष्य में, यहाँँ तक कि अगले जन्मों में भी प्राप्त हो सकता है। कर्म का सिद्धान्त जीवन में व्याप्त असमानताओं, सुख-दुःख, भाग्य और पुनर्जन्म की व्याख्या करने का एक महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत करता है। इस शोध आलेख में वैदिक, उपनिषदिक, गीता, बौद्ध, जैन, योग, वैशेषिक, मीमांसा एवं वेदान्त दर्शन में कर्म की अवधारणा का विश्लेषण किया गया है। वैदिक परम्परा में कर्म मुख्य रूप से यज्ञीय एवं धार्मिक अनुष्ठानों से संबद्ध था, जबकि उपनिषदों में इसे नैतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से परिभाषित करते हुए पुनर्जन्म और मोक्ष के साथ जोड़ दिया गया। बौद्ध दर्शन में कर्म का आधार चेतना को मानते हुए इसे अनात्मवाद और प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धान्तों से जोड़ दिया गया। वहीं जैन दर्शन कर्म को सूक्ष्म भौतिक कणों के रूप में स्वीकार करते हुए उसे बंधन का कारण स्वीकार करता है। सम्यक् दर्शन, ज्ञान एवं आचरण के द्वारा इन कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त करता है। वैशेषिक दर्शन में सात पदार्थों के अन्तर्गत कर्म की व्याख्या गति के रूप में की गई है। योग दर्शन में कर्म की व्याख्या क्लेष, कर्म संस्कार एवं कर्मफल के सन्दर्भ में की गई है। भगवद्गीता में कर्मयोग की शिक्षा दी गई है। मीमांसा दर्शन में जहाँँ कर्म की कर्मकाण्ड मूलक व्याख्या की गई है वहीं वेदान्त दर्शन में कर्म की तत्वमीमांसीय व्याख्या की गई है। अतः विभिन्न दार्शनिक परम्पराओं में कर्म की व्याख्याओं में भिन्नता होने पर भी सर्वमान्य धारणा यह है कि मनुष्य अपने कर्मों का स्वयं उŸारदायी है और उसके कर्म ही भविष्य का निर्माण करते हैं। इस प्रकार कर्म की अवधारणा भारतीय चिंतन की आधारशिला के रूप में मानव जीवन को नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक दिशा प्रदान करती है।

मुख्य शब्दः कर्म, कर्मफल, पुनर्जन्म, बंधन, मोक्ष, नैतिक नियम, भारतीय दर्शन

How to cite: Singh, K. K. (2026). भारतीय दर्शन में कर्म की अवधारणा. Anubodhan, 2(2), 54–58. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.059

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