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ANUBODHAN

A Peer Reviewed Multidisciplinary Quarterly Research Journal

भरतमुनिकृत  नाट्यशास्त्रीय भाव एवं विभाव का स्वरूप विश्लेषण

अविनाश कुमार पाण्डेय

शोधच्छात्र, संस्कृत विभाग, नव नालन्दा महाविहार, (सम-विश्वविद्यालय), संस्कृति मन्त्रालय, भारत सरकार, नालन्दा, बिहार

E-mail: 12avinaskumar@gmail.com

IssueVolume 2 No. 2 (June 2026) Anubodhan

प्राप्तिः 15 जून 2026 / स्वीकृतः 19 जून 2026 / प्रकाशित ऑनलाइन: 27 जून 2026

DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.065

Abstract

रस-सिद्धान्त भारतीय काव्यशास्त्र का आधार है, जिसका उद्गम ‘भाव’ से माना गया है । आचार्य भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र रस सिद्धान्त का प्रामाणिक ग्रन्थ स्वीकृत है, जहाँ रस की निष्पत्ति के लिए विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारिभावों का समन्वय आवश्यक माना गया है । आचार्य भरत ने भावों को रसोत्पादक तत्त्व के रूप में स्वीकार करते हुए स्थायीभाव, व्यभिचारिभाव तथा सात्त्विकभाव का निरूपण किया है । जिसमें ‘स्थायीभाव’ मानव-हृदय में स्थिरता पूर्वक निहित वह मनोविकार हैं, जो विभावादि के संयोग से रसस्वरूप को प्राप्त होते हैं । ‘व्यभिचारिभाव’ स्थायीभाव के पोषक एवं सहायक होते हैं, जबकि ‘सात्त्विकभाव’ अन्तःकरण की तीव्र भावावस्था के शारीरिक संकेत हैं । ठीक इसी प्रकार रसनिष्पत्ति का कारण ‘विभाव’ को माना है । उनके अनुसार ‘आलम्बन’ तथा ‘उद्दीपन’ ये विभाव के दो भेद हैं । आलम्बन विभाव, भाव का आश्रय एवं विषय का बोध कराता है, जबकि उद्दीपन विभाव, भावों को उद्दीप्त करने वाले बाह्य साधनों का द्योतक है । ये भाव एवं विभाव मात्र नाट्यकला के ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण भारतीय सौन्दर्यशास्त्र के आधारभूत तत्त्व हैं । इनके माध्यम से दर्शक के अन्तःकरण में रसानुभूति का उद्भव होता है तथा काव्य एवं नाट्य की कलात्मकता पूर्णता को प्राप्त करती है ।

     प्रस्तुत शोधालेख आचार्य भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्रीय ‘भाव’ एवं ‘विभाव’ के स्वरूप, कार्य एवं नाट्य में उपयोगिता पर केन्द्रित है । आचार्य भरत के अतिरिक्त प्रमुख आचार्यों की व्याख्याओं के आधार पर उसके सैद्धान्तिक आधार, कार्यप्रणाली तथा रस-निष्पत्ति में भूमिका का सम्यक् मूल्यांकन किया जाना अपेक्षित है ।

मुख्य शब्द:  नाट्यशास्त्र, भरतमुनि, भाव, विभाव, व्यभिचारिभाव, स्थायीभाव, सात्त्विकभाव, आलम्बन, उद्दीपन ।

How to cite: Pandey, A. K. (2026). भरतमुनिकृत  नाट्यशास्त्रीय भाव एवं विभाव का स्वरूप विश्लेषण. Anubodhan, 2(2), 86–91. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.065

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