डॉ० संजीव कुमार
सहायक प्राध्यापक (हिन्दी), हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, क्षेत्रीय केंद्र, धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश
E-mail: sanju26971@gmail.com
Issue: Volume 2 No. 2 (June 2026) Anubodhan
प्राप्तिः 27 जून 2026 / स्वीकृतः 30 जून 2026 / प्रकाशित: 30 जून 2026
DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.087
Abstract
परिवार मानव समाज की सबसे प्राचीन और स्थाई संस्था है। यह एक ऐसी इकाई है जो व्यक्ति, परिवेश एवं समाज के मध्य कड़ी का कार्य करती है। परिवार ही वह माध्यम है जिसके द्वारा संस्कार, मूल्य और नैतिकता एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होते हैं। परिवार के मुख्य स्तंभ कहे जाने वाले माता-पिता अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए संतानों का पालन-पोषण तथा शिक्षा जैसी जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। चूंकि भारतीय समाज में लंबे अरसे से संयुक्त परिवार की परंपरा बनी रही है, इसमें पूरे परिवार के सदस्य एक साथ रहते थे और जीवन में सामंजस्य, सहयोग तथा सम्मान का स्वस्थ वातावरण बना रहता था। किंतु समय के बदलाव के कारण सामाजिक तथा आर्थिक विषमताएं उत्पन्न हुईं। औद्योगीकरण और शहरीकरण ने संयुक्त परिवार की नींव को कमजोर किया। परिणामस्वरुप संयुक्त परिवार का विघटन शुरू हुआ और एकल परिवारों की नींव मजबूत हुई। एकल परिवारों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता तो मिली किंतु इसके साथ ही तनाव, घुटन, एकाकीपन और निराशा जैसी समस्याएं भी बढीं जिसके प्रभावस्वरूप पारिवारिक संबंधों की मधुरता खत्म हो रही है। पारिवारिक सदस्यों में तनाव कुंठा जैसी ग्रंथियां उत्पन्न हो रही हैं।
बीज शब्द: परिवार, मूल्य, संघर्ष, सामंजस्य, वात्सल्य, विघटन
How to cite: Kumar, S. (2026). अजय शर्मा के उपन्यासों में चित्रित पारिवारिक संघर्ष और सामंजस्य : एक अध्ययन . Anubodhan, 2(2), 259–261. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.087