Peer Reviewed | Open Access

बृहत्संहिता में स्थापत्यविज्ञान एवं निर्माणकौशल : प्राचीन भारतीय वास्तुपरम्परा का तात्त्विक एवं प्रायोगिक अनुशीलन

उदय कर्मकार

शोधच्छात्र, स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग, राँची विश्वविद्यालय, राँची, झारखण्ड, भारत

E-mail: udaykarmakar127@gmail.com

Issue: Vol. 2 No. 3 (September 2026) – Anubodhan

प्राप्तिः 17 सितम्बर 2026 / स्वीकृतः 24 सितम्बर 2026 / प्रकाशित: 30 सितम्बर 2026

DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.136

Abstract

भारतीय ज्ञान-परम्परा में वास्तुकला केवल आवासगृह, राजप्रासाद अथवा देवमन्दिर के निर्माण की निर्माणविद्या नहीं है। इसके साथ भूमिचयन, दिक्-निर्णय, मापन, गृहविन्यास, द्वार एवं स्तम्भों की योजना, जलस्रोतों का अन्वेषण पर्यावरणचेतना तथा धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यताएँ अन्तरङ्ग रूप से सम्बद्ध हैं। वराहमिहिर-प्रणीत बृहत्संहिता में वास्तु-विषयक विवेचन के माध्यम से इस बहुमुखी ज्ञानव्यवस्था का एक सुव्यवस्थित रूप दृष्टिगोचर होता है। विशेषतः वास्तुविद्या, उद्गार्गल तथा प्रासादलक्षण से सम्बद्ध अध्यायों में भूमि एवं गृह के मापन, वास्तुपुरुष की संकल्पना, वास्तुमण्डल की संरचना, मर्मस्थानों, गृह के विभिन्न अवयवों की परिमिति, द्वार, स्तम्भ, शाला एवं आलिन्द की योजना तथा देवमन्दिरों के स्थापत्यरूप के सम्बन्ध में विस्तृत निर्देश प्राप्त होते हैं।

इस विवेचन में वास्तुकला को एक साथ परिमाणविज्ञान, निर्माणप्रौद्योगिकी, पर्यावरणविज्ञान तथा धार्मिक-सांस्कृतिक विधानों के समन्वित रूप में प्रस्तुत किया गया है। विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि गृहनिर्माणप्रसङ्ग में जहाँ निश्चित माप, परिमाण एवं अनुपात के अनुसरण पर गुरुत्व आरोप किया गया है, वहीं देवमन्दिरनिर्माण के प्रसङ्ग में स्थान की पवित्रता, जलाशयों, उद्यानों, प्राकृतिक सौन्दर्य तथा देवता के अनुकूल परिवेश को भी महत्त्व प्रदान किया गया है। फलतः बृहत्संहिता में प्रतिपादित वास्तु-चिन्तन प्राचीन भारतीय निर्माणकुशलता को केवल स्थापत्यकला की परिधिओं में आबद्ध न रखकर उसे एक सुव्यवस्थित जीवनदर्शन तथा प्रयोगधर्मी ज्ञान-व्यवस्था के साथ संयुक्त करता है। इस दृष्टि से बृहत्संहिता का वास्तु-विवेचन भारतीय स्थापत्यपरम्परा के निर्माणशैली पर्यावरणगत सांस्कृतिक तथा दार्शनिक बिन्दुओं के समन्वित अध्ययन के लिए एकान्त उल्लेखनीय स्रोत के रूप में परिगणित होता है।

प्रमुख शब्द: बृहत्संहिता, वराहमिहिर, वास्तुविद्या, मर्मस्थान, गृह-निर्माण, उद्गार्गल, प्रासादलक्षण, भारतीय वास्तुकला।

How to cite: Karmakar, U. (2026). बृहत्संहिता में स्थापत्यविज्ञान एवं निर्माणकौशल : प्राचीन भारतीय वास्तुपरम्परा का तात्त्विक एवं प्रायोगिक अनुशीलन. Anubodhan, 2(3), 395–403. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.136

Scroll to Top