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भारतीय संविधान का पुनर्विचार: संवैधानिक परिवर्तन, मूल संरचना और सामाजिक-आर्थिक न्याय की खोज

डॉ० इंदु बघेल

एसोसिएट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, भारती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

E-mail: indubaghel2010@gmail.com

Issue: Vol. 2 No. 3 (September 2026) – Anubodhan

प्राप्तिः 18 सितम्बर 2026 / स्वीकृतः 25 सितम्बर 2026 / प्रकाशित ऑनलाइन: 28 सितम्बर 2026

DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.118

Abstract

भारतीय संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत तथा 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। यह भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है और शासन-व्यवस्था, मौलिक अधिकारों, राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों तथा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की अवधारणा को संस्थागत आधार प्रदान करता है। संविधान निर्माताओं ने यह स्वीकार किया था कि समाज स्थिर नहीं है और समय के साथ सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों में परिवर्तन होगा। इसलिए संविधान में संशोधन की व्यवस्था की गई, ताकि बदलती परिस्थितियों के अनुरूप संवैधानिक व्यवस्था को विकसित किया जा सके।

     यह शोध-पत्र भारतीय संविधान में संशोधन की आवश्यकता, उसकी प्रकृति और सीमाओं का विश्लेषण करता है। इसमें संविधान निर्माण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से लेकर अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संवैधानिक संशोधन की प्रक्रिया तथा न्यायपालिका द्वारा विकसित मूल संरचना सिद्धांत का अध्ययन किया गया है। शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ, सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य, गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण, मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ तथा वामन राव बनाम भारत संघ जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों के माध्यम से संसद और न्यायपालिका के बीच संवैधानिक शक्ति के संतुलन को समझने का प्रयास किया गया है।

     शोध-पत्र में सामाजिक एवं आर्थिक न्याय, राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों, व्यक्तिगत विधियों तथा समान नागरिक संहिता के प्रश्न का भी विश्लेषण किया गया है। अध्ययन का प्रमुख निष्कर्ष है कि संविधान में परिवर्तन समय की आवश्यकताओं के अनुरूप आवश्यक हो सकता है, किंतु ऐसा परिवर्तन संविधान की मूल भावना, लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता, धर्मनिरपेक्षता तथा मौलिक अधिकारों को नष्ट करने वाला नहीं होना चाहिए। मूल संरचना सिद्धांत संविधान में परिवर्तन और संवैधानिक निरंतरता के बीच एक महत्वपूर्ण संतुलन स्थापित करता है।

प्रमुख शब्द: भारतीय संविधान, संविधान संशोधन, मूल संरचना सिद्धांत, अनुच्छेद 368, सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय, राज्य के नीति-निर्देशक तत्व, समान नागरिक संहिता, मौलिक अधिकार, न्यायपालिका।

How to cite: Baghel, I. (2026). भारतीय संविधान का पुनर्विचार: संवैधानिक परिवर्तन, मूल संरचना और सामाजिक-आर्थिक न्याय की खोज. Anubodhan, 2(3), 247–252. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.118

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