अंशुमान दूबे1 और डॉ. अनुपम सिंह2
1शोधार्थी (UGC JRF), 2सहायक आचार्य, शिक्षाशास्त्र विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर
ई-मेल: danshuman65@gmail.com
Issue: Volume 2 No. 1 (March 2026) Anubodhan
प्राप्तिः 25 मार्च 2026 / स्वीकृतः 29 मार्च 2026 / प्रकाशितः 31 मार्च 2026
DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n1.2026.040
Abstract
यह शोध पत्र गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के प्रमुख पात्रों के माध्यम से सामाजिक-भावनात्मक अधिगम (Social Emotional Learning – SEL) की अवधारणा का विश्लेषण करता है। आधुनिक शिक्षा प्रणाली में SEL एक अनिवार्य तत्व बन चुका है जो विद्यार्थियों के भावनात्मक, सामाजिक और नैतिक विकास को सुनिश्चित करता है। CASEL (Collaborative for Academic,Social and Emotional Learning) के अनुसार SEL के पाँच मूल घटक हैं– आत्म-जागरूकता, आत्म-प्रबंधन, सामाजिक जागरूकता, संबंध कौशल और उत्तरदायी निर्णय क्षमता। यह अध्ययन दर्शाता है कि रामचरितमानस में वर्णित पात्रों के व्यवहार, संवाद और निर्णयों में ये सभी घटक स्पष्ट रूप से विद्यमान हैं।
भगवान राम का संयमित और मर्यादित आचरण आत्म-जागरूकता और उत्तरदायित्व का प्रतीक है। सीता का साहस, धैर्य और सामाजिक मूल्य-बोध आत्म-प्रबंधन और सामाजिक चेतना का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। हनुमान की सेवा भावना, निष्ठा और संवाद कौशल संबंध निर्माण और भावनात्मक बुद्धिमत्ता को दर्शाते हैं। भरत का आत्म-त्याग और नेतृत्व उत्तरदायी निर्णय क्षमता की मिसाल है, जबकि रावण का चरित्र आत्म-अवबोध की कमी और नकारात्मक भावनात्मक निर्णयों का प्रतिनिधित्व करता है। यह शोध प्रस्तावित करता है कि रामचरितमानस जैसे सांस्कृतिक ग्रंथों को विद्यालयीन पाठ्यक्रम में SEL दृष्टिकोण से समाहित किया जाए। इससे न केवल भारतीय सांस्कृतिक चेतना का संवर्धन होगा बल्कि छात्रों में करुणा, नैतिक विवेक और उत्तरदायित्व जैसे जीवनमूल्य भी विकसित होंगे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की दृष्टि से यह प्रयास समग्र शिक्षा की दिशा में एक सार्थक योगदान सिद्ध हो सकता है।
मुख्य शब्द: रामचरितमानस, सामाजिक-भावनात्मक अधिगम, नैतिक शिक्षा, भारतीय संस्कृति, NEP 2020, भावनात्मक बुद्धिमत्ता, चरित्र निर्माण
How to cite: Dubey, A. & Singh, A. (2026). रामचरितमानस और सामाजिक – भावनात्मक अधिगम : भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का सजीव सेतु. Anubodhan, 2(1), 423–431. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n1.2026.040