डॉ० विद्या विपुल शर्मा
शोधार्थी, दर्शनशास्त्र विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर
ई-मेल: vidhyadarshan@yahoo.com
Issue: Volume 2 No. 1 (March 2026) Anubodhan
प्राप्तिः 25 मार्च 2026 / स्वीकृतः 27 मार्च 2026 / प्रकाशितः 31 मार्च 2026
DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n1.2026.028
Abstract
प्रस्तुत शोध पत्र बौद्ध दर्शन की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में व्यावहारिकता प्रमाणित करने का दर्शन जगत में एक नवीन प्रयास है। बुद्ध के वचनों के आलोक में जो मार्गदर्शन हमें मिला है उसे हमारे पक्ष में समझने का प्रयास है। भारतीय दर्शन के सभी दार्शनिक विश्व को दुःख:मय मानते हैं। जीवन भर इंद्रिय सुख, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि तथा अतियों के पीछे भागता मन एक दिन इन सब से थक कर इस भोग विलास को छोड़कर त्यागी होने की ओर बढ़ता है, लेकिन भागना शुरू रहता है, कुछ पाने की इच्छा सदैव रहती है। बहुत कुछ पा लेना, या बहुत कुछ छोड़ देना, यह सब मन का ही खेल है। मन दोनों अतियों के बीच भागता है। इन्हीं अतियों से बचना है। अति जीवन की हो या मृत्यु की, भूख की हो या त्याग की, संसार की हो या निर्माण, की यह सभी पतन की ओर ले जाती है। इन अतियों से मुक्त होना ही मध्यम मार्ग है। जो मन के द्वारा निर्मित इन अतियों से मुक्त है वही दु:ख से मुक्त हो सकता है। वीणा के तार मध्यम खींचो, पर मध्यम ढीला रखो, यही निर्वाण का मार्ग है। निर्वाण का अर्थ है सभी इच्छाओं का छूट जाना, तभी व्यक्ति मन से ऊपर उठता है। जब वह सभी इच्छाओं को छोड़कर मोक्ष की इच्छा करने लगता है, तभी वह तथागत या बुद्ध कहलाता है, विरक्त होने की और जाता है।
बुद्ध ने सांसारिक सुखों में लिप्त होने या कठोर संयम और तपस्या में लीन होने, इन चरम अतियों के बजाय मध्यम मार्ग का सुझाव दिया, जिसका अनुसरण किया जाना चाहिए। ना जन्म ना मृत्यु, ना समाप्ति ना स्थायित्व, ना एकरूपता ना विविधता, ना आना ना जाना—इन आठ निषेधों के मध्यम मार्ग होते हैं—वह मार्ग या वह पथ जो ध्रुवीय चरम सीमाओं से परे है और विरोधी विचारों की चरम सीमाओं से परे है। तथागत और बुद्ध का मध्यम मार्ग खुली उड़ान एवं मुक्ति की राह दिखाता है। बुद्ध का मध्यम मार्ग उनकी शिक्षाओं का मुख्य आधार है। महान सिद्धियों के पश्चात बुद्ध ने अतिवाद से दूर रहने की शिक्षा दी इसे ही मध्यम मार्ग की शिक्षा कहते हैं। बुद्ध की शिक्षाएं हमें संस्कृत में बोधि नामक अवस्था की और मार्गदर्शन करती है जिसका अर्थ आत्म साक्षात्कार होता है और यही सर्वोच्च अवस्था है। उनके क्रांतिकारी विचारों का प्रभाव मानव जाति पर रहा।
बीज-शब्द : बौद्ध दर्शन, महात्मा बुद्ध, अष्टांगिक मार्ग, प्रतीत्यसमुत्पाद, भारतीय दर्शन, निर्वाण
How to cite: Sharma, V. V. (2026). महात्मा बुद्ध का मध्यम मार्ग: वर्तमान में प्रासंगिकता. Anubodhan, 2(1), 294–303. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n1.2026.028