Sipra Pal
Ph.D. Research Scholar, Department of Sanskrit, Sido Kanhu Murmu University, Dumka, Jharkhand
E-mail: siprapal7432@gmail.com
Issue: Volume 2 No. 1 (March 2026) Anubodhan
प्राप्तिः 25 मार्च 2026 / स्वीकृतः 27 मार्च 2026 / प्रकाशितः 31 मार्च 2026
DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n1.2026.027
Abstract
जिससे जगत- प्रपंच की सृष्टि हुई है, उन पंचमहाभूतों में प्रधान तत्त्व है जल, तथा उस जल का मुख्य स्रोत है नदियाँ । संस्कृत वाङ्मय में नदियों का स्थान सर्वोपरि है । वेदों में नदियों को यज्ञ अनुष्ठानों का आधार तथा आध्यात्मिक चेतना जागृत करनेवाली दिव्य शक्ति के रूप में विभूषित किया गया है । ॠग्वेद और अथर्ववेद में नदियों के जल को रोग और अमंगल नाशक औषधि माना गया है । ॠषियों ने सरस्वती, सिन्धु, सरयू आदि नदियों से शारीरिक और मानसिक बल तथा ऊर्जा की प्रार्थना की है । शांति और आरोग्य के लिए भी यज्ञभूमि में नदियों का आह्वान किया गया है। ऋग्वेद में सरस्वती की स्तुति सबसे पवित्र और श्रेष्ठ नदी के रूप में की गई है। सरस्वती नदी से यह प्रार्थना की गई है कि वे अपने पवित्र धारायों से हमारे अशुद्धियों और मानसिक विकारों को दूर करें। महाभारत में नदियों को महाफलदायिनी और जीवनदायिनी माता कहा गया है– “विश्वस्य मातरः सर्वाः सर्वाश्चैव महाफलाः” (महाभारत भीष्मपर्व ९, ३७)। पुराणों के अनुसार पवित्र गङ्गा, यमुना, सरयू, शिप्रा आदि नदियों में स्नान करने से शारीरिक शुद्धि और मानसिक शांति मिलती है। चरक, सुश्रुत, वाग्भट आदि आयुर्वेदाचार्यों ने गङ्गा, यमुना ,सिन्धु, सरयू आदि नदियों के जल को पथ्य और उत्तम गुणों से युक्त बताया है। इन आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार नदियों के जल में उपस्थित प्राकृतिक गुणवत्ता शरीर को शुद्ध करता है और जीवन शक्ति को बढ़ाता है । प्रस्तुत शोधपत्र में संस्कृत वाङ्मय में नदियों का औषधियों महत्त्व का विवेचन किया गया है।
बीज शब्द : पथ्य, जीवनदायिनी, पवित्र, औषधि, नदियाँ, ॠग्वेद, अथर्ववेद
How to cite: Pal, S. (2026). संस्कृत वाङ्मय में नदियों का औषधीय महत्त्व. Anubodhan, 2(1), 286–293. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n1.2026.027