राजा राम
शोध अध्येता, दर्शनशास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ
ई-मेल: rajarkush@gmail.com
Issue: Volume 2 No. 1 (March 2026) Anubodhan
प्राप्तिः 19 मार्च 2026 / संशोधितः 25 मार्च 2026 / स्वीकृतः 24 मार्च 2026 / प्रकाशितः 31 मार्च 2026
DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n1.2026.019
Abstract
भारतीय योग परंपरा में हठयोगप्रदीपिका और पातंजल योगसूत्र ऐसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ हैं, जिनमें योग के दार्शनिक तथा साधनात्मक स्वरूप का व्यवस्थित प्रतिपादन प्राप्त होता है। पातंजल योगसूत्र में “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” के सूत्र के माध्यम से चित्तवृत्तियों के निरोध को योग का मूल तत्त्व माना गया है तथा अष्टांग योग की क्रमिक साधना के द्वारा कैवल्य की प्राप्ति को उसका परम लक्ष्य बताया गया है। दूसरी ओर हठयोगप्रदीपिका में स्वात्माराम ने आसन, प्राणायाम, षटकर्म, मुद्रा, बन्ध, नादानुसंधान तथा कुण्डलिनी-जागरण आदि साधनात्मक उपायों के माध्यम से शरीर, प्राण और मन की शुद्धि तथा स्थिरता स्थापित करते हुए राजयोग की सिद्धि का मार्ग प्रतिपादित किया है।
प्रस्तुत शोध का उद्देश्य हठयोगप्रदीपिका और पातंजल अष्टांग योग के मध्य विद्यमान दार्शनिक अंतर्संबंध का समालोचनात्मक परीक्षण करना है। इस संदर्भ में दोनों ग्रंथों में प्रतिपादित योग-साधना की पद्धतियों, उनके दार्शनिक आधार तथा आध्यात्मिक लक्ष्य का तुलनात्मक दृष्टि से विवेचन किया गया है। अध्ययन की प्रक्रिया मुख्यतः ग्रंथ-अध्ययन, तुलनात्मक पद्धति तथा दार्शनिक विश्लेषण पर आधारित है।
इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि यद्यपि दोनों ग्रंथों में योग-साधना की विधियाँ भिन्न रूप में प्रतिपादित हुई हैं, तथापि उनका अंतिम उद्देश्य साधक को उच्चतर आध्यात्मिक अवस्था तक पहुँचाना ही है। इस प्रकार हठयोगप्रदीपिका में वर्णित साधनाएँ पातंजल अष्टांग योग के सिद्धांतों से अंतर्संबद्ध हैं और उन्हें उसके साधनात्मक पूरक के रूप में समझा जा सकता है, जो साधक को समाधि तथा आत्मानुभूति की दिशा में अग्रसर करती हैं।
मुख्य शब्द: पातंजल योगसूत्र, अष्टांग योग , हठयोगप्रदीपिका, योग साधना, राजयोग, समाधि, दार्शनिक अंतर्संबंध
How to cite: Ram, R. (2026). हठयोगप्रदीपिका और पतंजलि के अष्टांग योग का दार्शनिक अंतर्संबंध : एक समालोचनात्मक अध्ययन. Anubodhan, 2(1), 194–207. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n1.2026.019