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ANUBODHAN

A Peer Reviewed Multidisciplinary Quarterly Research Journal

श्रीमद्भगवद्गीता का निष्काम कर्मयोग: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

डॉ. हरि नारायण

असिस्टेंट प्रोफेसर (सीनियर स्केल), दर्शनशास्त्र विभाग, बलि राम भगत कॉलेज, समस्तीपुर, बिहार

ई-मेल: harineelu1891@gmail.com

IssueVolume 2 No. 1 (March 2026) Anubodhan

प्राप्तिः 10 मार्च 2026 / स्वीकृतः 14 मार्च 2026 / प्रकाशितः 31 मार्च 2026

DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n1.2026.008

Abstract

धर्म, नीति और दर्शन की दृष्टि से गीता का भारत में ही नहीं संपूर्ण विश्व में महत्वपूर्ण स्थान है। गीता में निहित उपदेशों का सार्वभौमिक महत्व है। इसने संपूर्ण मानव-जाति को प्रभावित किया है। इसका प्रमाण यही है कि विश्व की अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद किया गया है। इसकी लोकप्रियता का सबसे प्रमुख कारण यही है कि इसमें मानव मात्र के जीवन से संबंधित जटिल से जटिल समस्याओं का विवेचन और वास्तविक समाधान प्रस्तुत किया गया है। गीता को सभी उपनिषदों का निचोड़ कहा जाता है। वेदांत दर्शन की ‘प्रस्थानत्रयी’ में इसे समादरणीय स्थान प्राप्त है। गीता का संदेश धर्म, संप्रदाय, व्यक्ति, देश-काल, जाति आदि से परे पूरे मानव-जाति के कल्याण के लिए है। जीवन के परम लक्ष्य के रूप में मोक्ष को स्वीकार करते हुए गीता इसके लिए ज्ञान, भक्ति और कर्म तीन मार्गों का निर्देश करती है, परंतु अत्यंत ही स्पष्ट रूप में ज्ञान और भक्ति को आधार रूप में स्वीकार करते हुए गीता निष्काम कर्म को ही अधिक महत्व प्रदान करती है। नैतिक दृष्टि से गीता के निष्काम कर्म का संदेश अत्यधिक महत्वपूर्ण है। निष्काम कर्म का अर्थ है कर्मफल आसक्ति का त्याग कर कर्म करना। गीता के अनुसार किसी भी दशा में मनुष्य को कर्म तो करना ही है, क्योंकि बिना कर्म किए मनुष्य रह नहीं सकता। ऐसी दशा में यदि कर्म निरासक्त होकर किया जाए तो वही कर्म मुक्ति की तरफ ले जाता है। प्रस्तुत शोध-आलेख में गीता में वर्णित निष्काम कर्म योग के वास्तविक स्वरूप को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है।

मुख्य शब्द: निष्काम कर्मयोग, फलासक्ति, कर्मसंन्यास, सकाम कर्म, लोकसंग्रह, समत्वभाव, स्थितप्रज्ञ।

How to cite: Narayan, H. (2026). श्रीमद्भगवद्गीता का निष्काम कर्मयोग: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन. Anubodhan, 2(1), 69–75. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n1.2026.008

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