डॉ. रेनू चौधरी
सहायक आचार्य, दर्शनशास्त्र विभाग, सी. एम. पी. डिग्री कॉलेज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज, E-mail: renu.chaudhry2009@gmail.com
Issue: Volume 1 No. 4 (December 2025) Anubodhan
Published: 31 December 2025
Abstract
भगवद्गीता भारतीय दर्शन का एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें मानव जीवन की गहन अस्तित्वगत समस्याओं का सूक्ष्म विवेचन मिलता है। महाभारत के युद्धक्षेत्र में अर्जुन का विषाद केवल व्यक्तिगत दुर्बलता नहीं है, बल्कि वह मानव अस्तित्व की सार्वभौमिक चिंता, नैतिक द्वंद्व और अर्थ-संकट का प्रतीक है। यह शोधपत्र अर्जुन विषाद को आधुनिक अस्तित्ववादी दर्शन के संदर्भ में पुनर्विश्लेषित करता है तथा यह प्रतिपादित करता है कि गीता का दर्शन अस्तित्वगत संकट से मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त करता है। अर्जुन का विषाद जीवन-मृत्यु, कर्तव्य-अकर्तव्य, हिंसा-अहिंसा, आत्मीयता-नैतिकता जैसे द्वंद्वों से उत्पन्न होता है। यह स्थिति ज्यां-पॉल सार्त्र, कीर्केगार्द और हाइडेगर द्वारा वर्णित ‘अस्तित्वगत चिंता’ से साम्य रखती है, जहाँ व्यक्ति स्वतंत्रता, उत्तरदायित्व और अर्थहीनता के भय से ग्रस्त होता है। गीता में अर्जुन युद्ध से पलायन करना चाहता है, जो अस्तित्वगत पलायन का द्योतक है। श्रीकृष्ण का उपदेश अर्जुन को कर्म, ज्ञान और भक्ति के माध्यम से अस्तित्वगत संकट से उबारने का प्रयास है। गीता का कर्मयोग ‘कर्तृत्व-बोध’ को शुद्ध करता है, ज्ञानयोग ‘स्व-स्वरूप’ का बोध कराता है और भक्तियोग जीवन को अर्थ और उद्देश्य प्रदान करता है। इस प्रकार गीता अस्तित्वगत चिंता का समाधान समन्वयात्मक दृष्टि से प्रस्तुत करती है।
मुख्य बिंदु: भगवद्गीता, अर्जुन विषाद योग, अस्तित्वगत चिंता, अस्तित्वगत पलायन, पाश्चात्य अस्तित्ववादी दर्शन
How to cite: Kumar, A., Dwivedi, A. (2025). भगवद्गीता और अस्तित्वगत चिंता : अर्जुन विषाद का दार्शनिक पुनर्विश्लेषण. Anubodhan, 1(4), 150–168. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v1n4.2025.039