cropped-LOGO_ANUBODHAN-removebg-preview1.png

ANUBODHAN

A Peer Reviewed Multidisciplinary Quarterly Research Journal

भारतीय दर्शन में प्रामाण्यवाद विमर्श: एक समीक्षात्मक विश्लेषण

डॉ. हरि नारायण

सहायक आचार्य, दर्शनशास्त्र विभाग, बलि राम भगत महाविद्यालय,  समस्तीपुर, बिहार

Issue: Volume 1 No. 4 (December 2025) Anubodhan

Published: 31 December 2025

Abstract

ज्ञान से विषय का प्रकाशन होता है, किंतु यहां सबसे प्रमुख समस्या उत्पन्न होती है कि विषय का जो प्रकाशन हो रहा है वह यथार्थ है या यथार्थ इसका निर्धारण किस प्रकार होगा? हम अपने दैनिक जीवन में यह अनुभव करते हैं कि हमारे बहुत सारे ज्ञान यथार्थ (विषय के अनुरूप) होते हैं लेकिन कई बार हमारा ज्ञान भ्रामक(अयथार्थ) भी हो जाता है जो विषय के अनुरूप नहीं होता है। अब प्रश्न यह उठता है कि कोई ज्ञान यथार्थ या अयथार्थ किन कारणों से होता है। भारतीय दार्शनिकों ने ज्ञान के स्वरूप तथा ज्ञान प्राप्ति के साधन (प्रमाणों) के निरूपण के साथ-साथ ज्ञान की यथार्थता(प्रामाण्य)और अयथार्थता(अप्रामाण्य) के विषय में गंभीरतापूर्वक विचार किया है। भारतीय दर्शन में यथार्थ ज्ञान को प्रमा और अयथार्थ ज्ञान को अप्रमा कहा गया है। यहां मुख्य प्रश्न यह है कि क्या ज्ञान प्रमाण रूप ही उत्पन्न होता है? या किसी अन्य ज्ञान के द्वारा उसकी प्रामाणिकता को सुनिश्चित किया जाता है? प्रामाण्यवाद के सिद्धांत में इसी प्रश्न पर गहनता से विचार किया जाता है। प्रस्तुत आलेख में भारतीय दर्शन में प्रामाण्यवाद से संबंधित विभिन्न विमर्शों को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है।

मुख्य शब्द: प्रामाण्य, अप्रामाण्य, ज्ञप्ति, ज्ञातता, अनुव्यवसाय, त्रिपुटी प्रत्यक्ष, प्रवृत्ति सामर्थ्य, सत्कार्यवाद।

How to cite: Narayana, H. (2025). भारतीय दर्शन में प्रामाण्यवाद विमर्श: एक समीक्षात्मक विश्लेषण. Anubodhan, 1(4), 100–111. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v1n4.2025.035

DOI: 10.65885/anubodhan.v1n4.2025.035

Scroll to Top