कुमारी रुकमणी
स्वतंत्र अध्येता, हिन्दी विभाग, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय
ई-मेल: sumanmahto123@gmail.com
Issue: Volume 2 No. 1 (March 2026) Anubodhan
प्राप्तिः 22 मार्च 2026 / संशोधितः 26 मार्च 2026 / स्वीकृतः 26 मार्च 2026 / प्रकाशितः 31 मार्च 2026
DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n1.2026.021
Abstract
रामचरितमानस का अध्ययन ऐतिहासिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करता है। यह ग्रन्थ मात्र एक धार्मिक ग्रन्थ ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति एवं जीवन-दर्शन का अभिन्न अंग है, जिसने सदियों से मानव जीवन के नैतिक मूल्यों, सामाजिक आदर्शों और आध्यात्मिक प्रेरणाओं का प्रवाह बनकर विश्व समुदाय में अपनी विशिष्ट छवि स्थापित की है। इसके अनेक पद एवं कथानक मानवता के मूलभूत संस्कारों को प्रतिबिम्बित करते हैं, जैसे अहिंसा, करुणा, सेवा और न्याय। भारतीय लोकमान्यताओं एवं परम्पराओं में इसकी गहरी पैठ होने से यह ग्रन्थ न केवल धार्मिक उपयोगिता, बल्कि सामाजिक एवं नैतिक शिक्षण का भी वृहद माध्यम रहा है। गोस्वामी तुलसीदास द्वारा सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में रचित यह महाकाव्य भारतीय संस्कृति को दर्शाता है। भाषात्मक शैली से रामचरितमानस की शब्दावली सहज एवं मधुर है, जो विभिन्न सामाजिक समूहों और आयु वर्ग के लोगों तक आसानी से पहुँचने में सक्षम है। इसके प्रवाह और अन्तःसामंजस्य ने इसे न केवल धार्मिक पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया बल्कि लोकजीवन का अभिन्न अंग भी बना दिया है।
रामचरितमानस का प्रभाव सदियों से भारतीय समाज में अपने नैतिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव के कारण है। इसकी लोकप्रियता विविध स्तरों पर प्रतिबिम्बित होती है- धार्मिक समारोह, पूजा-पाठ, धार्मिक शिक्षाओं, सामाजिक अनुष्ठानों में इसकी उपयोगिता है। साहित्यिक परम्परा में यह ग्रन्थ रामकथा की सांस्कृतिक विरासत को पोषित करता रहा है, एवं शिक्षण संस्थानों में अध्ययन का प्रमुख विषय बना रहा है। इसकी उपयोगिता शिक्षा-नीति में भी बढ़ रही है, जहाँ इसे राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाठ्यक्रम का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। इसके साथ ही डिजिटल युग में यह ग्रन्थ विभिन्न मीडिया प्लेटफार्मों तक पहुँच चुका है, जिससे इसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर परिपक्व हो रहा है।
रामचरितमानस का प्रस्तावना खण्ड इसकी गहरी सांस्कृतिक जड़ताओं, साहित्यिक विशिष्टताओं एवं वर्तमान समय में उसकी उपयोगिता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। यह ग्रन्थ परम्परा और समकालीनता का समागम है, जो न केवल भारतीय दर्शक एवं पाठक बल्कि विश्वभर के लिए प्रेरणादायी और मार्गदर्शक बन चुका है। इस अध्ययन से ज्ञात होता है कि यह ग्रन्थ व्यापक मानव मूल्यों की स्थापना के साथ-साथ शान्ति, सद्भाव और नैतिकता के विभिन्न आयामों को प्रचलित करने में एक समकालीन नैतिक और सांस्कृतिक पूंजी भी है, जो वैश्विक शान्ति के उद्देश्यों में सहायक सिद्ध हो सकती है।
How to cite: Rukmani, K. (2026). समकालीन परिदृश्य में रामचरितमानस की लोकप्रियता. Anubodhan, 2(1), 220–232. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n1.2026.021