डॉ० सूर्यकान्त त्रिपाठी
सहायक आचार्य, संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर
E-mail: suryakanttripathi4@gmail.com
Issue: Volume 2 No. 2 (June 2026) Anubodhan
प्राप्तिः 8 अप्रैल 2026 / संशोधित:11 जून 2026 / स्वीकृतः 12 जून 2026 / प्रकाशित ऑनलाइन: 27 जून 2026
DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.064
Abstract
भारतीय दार्शनिक परम्परा में पुरुषार्थ चतुष्टय, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, मानव जीवन के समग्र विकास का आधार माना गया है। प्रस्तुत शोध लेख में पुरुषार्थ चतुष्टय की पारम्परिक अवधारणा का समकालीन संदर्भों में पुनर्विश्लेषण किया गया है। अध्ययन का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि वर्तमान सामाजिक, आर्थिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक संकटों के समाधान में पुरुषार्थ चतुष्टय की अवधारणा किस प्रकार प्रासंगिक और उपयोगी है। लेख में धर्म को संकीर्ण धार्मिक पहचान के स्थान पर मानवीय कर्तव्यों, नैतिक मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में व्याख्यायित किया गया है। अर्थ को न्यायपूर्ण अर्जन, सदुपयोग और लोककल्याण से जोड़ा गया है, जबकि काम को केवल इन्द्रियसुख नहीं, बल्कि रचनात्मक आकांक्षा, कर्मशीलता और जीवन-उद्यम के रूप में देखा गया है। मोक्ष को जीवन से पलायन नहीं, बल्कि अज्ञान, लोभ, मोह और अहंकार से मुक्ति के रूप में समझाया गया है। प्रस्तुत शोध लेख में वर्णनात्मक तथा विश्लेषणात्मक शोध प्रविधि का उपयोग किया गया है। वैदिक, उपनिषदिक, स्मृतिग्रंथीय तथा गीता-आधारित संदर्भों के माध्यम से यह प्रतिपादित किया गया है कि पुरुषार्थ चतुष्टय आज भी व्यक्तिगत उन्नति, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय विकास के लिए एक प्रभावी जीवन-दर्शन प्रस्तुत करता है।
कुंजी शब्दः पुरुषार्थ चतुष्टय, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
How to cite: Tripathi, S. K. (2026). पुरुषार्थ चतुष्टय की साम्प्रतिक व्याख्या. Anubodhan, 2(2), 82–85. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.064