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ANUBODHAN

A Peer Reviewed Multidisciplinary Quarterly Research Journal

प्रेम की अवधारणा और दिनकर का काव्य

अजीत कुमार तिवारी 1 और प्रो० दीपक प्रकाश त्यागी 2

1 शोध छात्र, हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषा तथा पत्रकारिता विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर

2 प्रोफ़ेसर, हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषा तथा पत्रकारिता विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर

Corresponding author: अजीत कुमार तिवारी

E-mail: ajeetanita@gmail.com

IssueVolume 2 No. 2 (June 2026) Anubodhan

प्राप्तिः 24 जून 2026 / स्वीकृतः 27 जून 2026 / प्रकाशित ऑनलाइन: 29 जून 2026

DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.067

Abstract

रामधारी सिंह दिनकर का काव्य यथार्थ जगत के मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण है। दिनकर के काव्य वांग्मय का उदय छायावाद की पीठ पर हुआ था। अतः उनका काव्य जन भावना के रूप में इस ब्रह्माण्ड में एकमात्र सत्य और अनश्वर प्रेम को केन्द्रित कर आगे बढ़ता है जिसके वर्णन में उत्साह के रस का बादल अपनी गर्जना करते हैं। इनके काव्य में ओज, आक्रोश, क्रांति, पुरुषार्थ की जो तरंगे अबाध गति से मानवीय मन में ऊर्जा का संचार करती है, उसका का केंद्र अत्यंत कोमल है और इससे प्रेम के रस की अमृतमयी धारा बहकर इस धरित्री पर मानवीय सभ्यता को सफल बनाती है। प्रस्तुत लेख में रसवन्ती से लेकर उर्वशी तक के काव्य की रसमय पंक्तिया यह स्पष्ट करती है की दिनकर का काव्य-केंद्र मुख्यतः मानवीय जीवन के लिए अपरिहार्य शाश्वत प्रेम, प्रणय और सौन्दर्य का काव्य है जो समय-समय पर अपनी उर्जा के तापमान में कमी या वृद्धि करता है। दिनकर की राष्ट्रीय भावना या जन चेतना की कविता हो, सभी प्रेम की वर्षा की ही उपज है। यह प्रेम की अधिकता का इन्द्रधनुष ही है जो कभी पारिवारिक प्रेम दायित्यों को सामने लाता है तो कभी सामाजिक प्रेम सरोकारों को। एक ओर यह हुंकार, कुरुक्षेत्र, परशुराम की प्रतीक्षा के रूप में राष्ट्र के गौरव की बलिवेदी पर मर-मिटने को तैयार करता है तो दूसरी ओर उर्वशी के रूप में प्रेम के उच्चतर एवं अद्वितीय रूप को सामने रखकर मानव जीवन में इसकी आवश्यकता और सार्थकता को प्रमाणित करता है। दिनकर के काव्य के मंथन से प्रेम और सौन्दर्य की ऐसी मणि प्राप्त होती है जो ईश्वर रचित इस प्रकृति की उपादेयता में मानवीय जीवन में विराजमान प्रेम को अमरता प्रदान करती है।

बीज शब्दः प्रीति, प्रणय, पंचम पुरुषार्थ, पुष्टिमार्ग, सूफी, इश्कमिजाजी, इश्कहकिकी, प्रकृति प्रेम, मानव प्रेम, सुधा सिन्धु, उद्दात, आकुलता, प्रेम प्रतिदान

How to cite: Tiwari, A. K., & Tyagi, D. P. (2026). प्रेम की अवधारणा और दिनकर का काव्य. Anubodhan, 2(2), 97–102. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.067

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