अमित कुमार मण्डल
स्टेट एडेड कॉलेज टीचर, संस्कृत विभाग, श्रीकृष्ण महाविद्यालय, नदीया, पश्चिमवङ्ग, भारतवर्ष
E-mail: vyakarancharcha@gmail.com
Issue: Volume 2 No. 2 (June 2026) Anubodhan
प्राप्तिः 27 जून 2026 / स्वीकृतः 29 जून 2026 / प्रकाशित: 30 जून 2026
DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.075
Abstract
नव्यन्याय परंपरा के मूर्धन्य मनीषी महामहोपाध्याय श्री भवानन्द सिद्धान्तवागीश (अनुमानित काल १५२०-१५९५ ई.) के ऐतिहासिक काल-निर्धारण, गुरु-परंपरा तथा उनकी विरल ग्रन्थ-संपदा का एक आलोचनात्मक एवं साक्ष्य-आधारित अनुशीलन प्रस्तुत करता है। नवद्वीप (बंगाल) की बौद्धिक धरा पर अवतरित आचार्य भवानन्द ने रघुनाथ शिरोमणि तथा कृष्णदास सार्वभौम की महान न्याय-परंपरा को आगे बढ़ाया। यद्यपि तत्कालीन प्रादेशिक ईर्ष्या और विद्वेष के कारण बंगाल में उनकी कृतियों को पारंपरिक पाठ्यक्रमों में यथोचित स्थान नहीं मिल सका, परंतु दक्षिण भारत और काशी (वाराणसी) के विद्वत्समाजों में उनकी टीकाओं को अत्यधिक समादर प्राप्त हुआ। प्रस्तुत अध्ययन में आचार्य दिनेशचंद्र भट्टाचार्य, गोपीनाथ कविराज तथा प्रो. इंगल्स द्वारा प्रस्तुत अंतःसाक्ष्यों, पांडुलिपियों के लिपिकाल (जैसे ‘कारकचक्र’- १५६४ ई. तथा ‘दीधितिटिप्पणी’-१५९३ ई.) और ‘राढीय कुलपंजिका’ के साक्ष्यों का सम्यक विश्लेषण करते हुए सतीशचंद्र विद्याभूषण के परवर्ती काल-निर्धारण (१६२५ ई.) का तार्किक खंडन किया गया है। इसके अतिरिक्त, भवानन्द द्वारा रचित कुल ४२ ग्रन्थों की सूची में से ‘मणिदीधितिप्रकाश’, ‘प्रत्यक्षदीधिति-टीका’, ‘अनुमानदीधितिटीका’, ‘गुणदीधितिटीका’ तथा ‘लीलावतीशिरोमणिटीका’ जैसी दुर्लभ पाण्डुलिपियों की वर्तमान स्थिति, उनके पत्र-संख्यांकन तथा सुदूर पुस्तकालयों (जैसे लंदन स्थित इंडिया-हाउस) में उनकी उपलब्धता पर प्रकाश डाला गया है।
कुंजी–शब्द: नव्य-न्याय, पाण्डुलिपि विमर्श, नवद्वीप परंपरा, काल-निर्धारण, पारंपरिक अध्ययन, पाठ-आलोचना, पुष्पिका, परिभाषा।
How to cite: Mondal, A. K. (2026). नव्य न्याय परंपरा में नैयायिक श्री भवानंद सिद्धांतवागीश: एक समीक्षात्मक अध्ययन. Anubodhan, 2(2), 168–175. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.075