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ANUBODHAN

A Peer Reviewed Multidisciplinary Quarterly Research Journal

नाथ संप्रदाय के गोरक्षपीठ का राष्ट्रवादी विमर्श : 19वीं और 20वीं शताब्दी का विश्लेषण

गौरव प्रताप राव1 और प्रियांशु सिंह2

1शोध छात्र, समाजशास्त्र विभाग, 2शोध छात्र, राजनीतिशास्त्र विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी

E-mail: gauravprao9450@gmail.com

IssueVolume 2 No. 1 (March 2026) Anubodhan

प्राप्तिः 2 मार्च 2026 / संशोधितः 24 मार्च 2026 / स्वीकृतः 24 मार्च 2026 / प्रकाशितः 31 मार्च 2026

DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n1.2026.005

Abstract

भारत में राष्ट्रवाद का विकास केवल राजनीतिक घटनाओं का परिणाम नहीं था, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं से भी गहराई से प्रभावित था। इस शोध-पत्र में नाथ संप्रदाय, विशेषकर गोरखपीठ, गोरखपुर की राष्ट्रवादी भूमिका का विश्लेषण किया गया है। ऐतिहासिक दृष्टि से गोरखनाथ और उनके अनुयायियों ने मध्यकालीन समाज में जाति विरोधी और जनकेंद्रित विचार प्रस्तुत किए, जिसने आगे चलकर आधुनिक राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि तैयार की। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में गोरखपीठ के महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ ने धार्मिक मंचों को राजनीतिक संघर्ष से जोड़ा। दिग्विजयनाथ ने स्वतंत्रता संग्राम और हिंदू महासभा में सक्रिय भागीदारी की, जबकि अवेद्यनाथ ने स्वतंत्रता-उपरांत काल में शिक्षा, स्वास्थ्य और समाजसेवा के माध्यम से राष्ट्रवादी विमर्श को आगे बढ़ाया। गोरखपीठ, गोरखपुर का राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक सक्रियता तक सीमित नहीं था; इसमें सामाजिक समरसता, शिक्षा का प्रसार और सांस्कृतिक पुनरुत्थान भी सम्मिलित थे। गोरखपुर की रामलीला और अन्य धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों को जनजागरण और राजनीतिक चेतना का माध्यम बनाया गया। तुलनात्मक दृष्टि से गोरखपीठ, गोरखपुर का राष्ट्रवाद आर्य समाज और रामकृष्ण मिशन जैसे अन्य धार्मिक आंदोलनों से भिन्न था, क्योंकि इसमें धार्मिक नेतृत्व सीधे राजनीतिक मंच पर सक्रिय हुआ। यह शोध यह स्पष्ट करता है कि गोरखपीठ, गोरखपुर ने राष्ट्रवाद को केवल सत्ता संघर्ष न रखकर एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया। इस प्रकार, गोरखपीठ, गोरखपुर भारतीय राष्ट्रवाद की बहुआयामी संरचना को समझने में अनिवार्य कड़ी है।

मुख्य शब्द:  नाथ संप्रदाय, गोरखपीठ, महंत दिग्विजयनाथ, महंत अवेद्यनाथ, राष्ट्रवाद, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, हिंदू महासभा

How to cite: Rao, G. P, Singh, P. (2026). नाथ संप्रदाय के गोरक्षपीठ का राष्ट्रवादी विमर्श : 19वीं और 20वीं शताब्दी का विश्लेषण. Anubodhan, 2(1), 38–46. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n1.2026.005

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