डॉ० मल्लिका मंजरी
असिस्टेंट प्रोफेसर, विश्वविद्यालय इतिहास विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार
E-mail: mallikabhagalpur@gmail.com
Issue: Vol. 2 No. 3 (September 2026) – Anubodhan
प्राप्तिः 8 जुलाई 2026 / स्वीकृतः 16 जुलाई 2026 / प्रकाशित ऑनलाइन: 23 जुलाई 2026
DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.092
Abstract
भारतीय साहित्य में संस्कृत साहित्य सर्वप्राचीन, विस्तीर्ण और विविधतापूर्ण रहा है। इस भाषा में साहित्य की सारी विधाओं- गद्य-पद्य आदि एवं ज्ञान की समस्त शाखाओं- राजनीति, दर्शन, गणित-ज्योतिष चिकित्सा, रसायन, कथा, काव्य आदि में साहित्य रचना की गयी। इनमें राजनीतिपरक ग्रंथों की बहुत ख्याति है जिनमें प्राचीन भारतीय जन की राजनीतिक चेतना, विचार, प्रशासनिक संस्थायें, उनकी कार्यविधि का पता चलता है पर कई ऐसे भी साहित्य हैं जो राजनीतिक साहित्य नहीं हैं पर अप्रत्यक्ष रूप से प्राचीन भारतीयों की राजनीतिक चेतना और संस्थाओं की जानकारी देते हैं। मृच्छकटिकम ऐसा ही साहित्य है जो है तो नाट्य साहित्य पर वह प्राचीन भारतीय समाज-संस्कृति एवं राजनीति की जानकारी देता है।
मृच्छकटिकम शूद्रक रचित नाटक है जो संस्कृत का पहला सामाजिक नाटक है। इसमें अभिजात्य या समृद्ध वर्ग के बजाय साधारण जन जीवन की झांकी है। एक व्यापारी जो अपनी संपत्ति खो चुका है वह एक विवाहित होकर भी एक नर्तकी को चाहता है। उस नर्तकी पर उस नगर के राजा के साले की नजर थी। और घूमते घटनाक्रम के चक्र ने उस व्यापारी को उसी नर्तकी की हत्या का आरोपी बनाया और ऐन मृत्युदंड के समय वास्तविक अपराधी का भेद खुला और वास्तविक अपराधी पकड़ा गया। इस सब से उद्विग्न नगरजन सत्ता परिवर्तन कर देते हैं। यानि दो प्रेमियों का मिलन-बिछोह और पुनर्मिलन इन्हीं सब विवरणों में तत्कालीन समय में प्रचलित राजनीतिक चिंतन, शासन स्वरूप, संस्थाओं और कार्यविधि की झलक मिलती है।
बीजशब्दः भारतीय राजनीतिक चिंतन, भारतीय राजनीतिक संस्थाएं, मृच्दकटिकम, शूद्रक, नाटक।
How to cite: Manjari, M. (2026). मृच्छकटिकम में वर्णित राजनीतिक चिंतन एवं संस्थाएं: एक अवलोकन. Anubodhan, 2(3), 11–18. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n3.2026.092