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ANUBODHAN

A Peer Reviewed Multidisciplinary Quarterly Research Journal

बौद्ध अपोह सिद्धांत की समकालीन सामाजिक-दार्शनिक उपादेयता : भाषा, सत्य और सत्ता के संदर्भ में

भीम शंकर मीना

शोधार्थी, दर्शनशास्त्र विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर, राजस्थान

E-mail: iambheemshankar18@gmail.com

IssueVolume 2 No. 2 (June 2026) Anubodhan

प्राप्तिः 10 जून 2026 / स्वीकृतः 19 जून 2026 / प्रकाशित ऑनलाइन: 26 जून 2026

DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.063

Abstract

प्रस्तुत शोध पत्र का महत्वपूर्ण उद्देश्य यह बताना है कि बौद्ध दार्शनिक परंपरा में विकसित अपोह सिद्धांत की यह विशेषता रही है कि उसने भाषा को केवल विचारों के संप्रेषण का साधन न मानकर, उसे ज्ञान-निर्माण, व्यवहार और सामाजिक संबंधों से गहराई से जोड़कर देखा है। अपोह सिद्धांत इसी दृष्टि का एक महत्वपूर्ण दार्शनिक प्रतिफल है, जिसके अनुसार शब्दों का अर्थ किसी स्थायी या सार्वभौमिक सत्ता से नहीं, बल्कि भिन्नता, निषेध और व्यवहारिक संदर्भों के माध्यम से निर्मित होता है। शोध पत्र में यह प्रतिपादित किया गया है कि समकालीन समाज में धर्म, दर्शन और राजनीति जिस प्रकार सत्य और सत्ता के दावों के माध्यम से स्वयं को स्थापित करते हैं, उसमें भाषा की भूमिका अत्यंत निर्णायक हो जाती है। धार्मिक विश्वास, दार्शनिक तर्क और राजनीतिक विचारधाराएँ भाषा के माध्यम से ही अर्थ ग्रहण करती हैं और सामाजिक यथार्थ को प्रभावित करती हैं। अपोह सिद्धांत इन भाषिक प्रक्रियाओं को समझने में एक आलोचनात्मक दृष्टि प्रदान करता है और यह स्पष्ट करता है कि सत्य के दावे किस प्रकार सत्ता-संरचनाओं से संबद्ध होते हैं। इस समकालीन आयाम के माध्यम से यह अध्याय यह दिखाने का प्रयास करता है कि अपोह सिद्धांत केवल एक पारंपरिक भाषार्थ-सिद्धांत नहीं है, बल्कि वह बहुलतावाद, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और समकालीन राजनीतिक विमर्शों को समझने के लिए भी एक प्रासंगिक दार्शनिक आधार प्रस्तुत करता है। इस प्रकार बौद्ध अपोह सिद्धांत सत्य एवं सत्ता के द्वंद्व और उनके संभावित सामंजस्य को समझने में एक जीवंत और अर्थपूर्ण दार्शनिक संसाधन के रूप में उभरता है।

बीज शब्द: अपोह सिद्धांत, भाषा और सत्य, सत्ता एवं धर्म-दर्शन-राजनीति, बहुलतावाद, समकालीन भारतीय चिंतन एवं आयाम

How to cite: Meena, B. S. (2026). बौद्ध अपोह सिद्धांत की समकालीन सामाजिक-दार्शनिक उपादेयता : भाषा, सत्य और सत्ता के संदर्भ में. Anubodhan, 2(2), 73–81. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.063

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