राजश्री कुमारी
शोध छात्रा, विश्वविद्यालय इतिहास विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर
E-mail: rajshreekumari869@gmail.com
Issue: Volume 2 No. 2 (June 2026) Anubodhan
प्राप्तिः 3 जून 2026 / स्वीकृतः 12 जून 2026 / प्रकाशित ऑनलाइन: 16 जून 2026
DOI: https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.060
Abstract
भक्तिकालीन निर्गुण धारा के सन्त कवि कबीरदास उन कवियों में अग्रगण्य हैं जो निर्गुण ईश्वर के उपासक हैं। कबीर ने निर्गुण निराकार परामात्मा के लिए अनेक नामों का प्रयोग किया है। एक ओर तो वे उसे अल्लाह, करीम, खुदा, रहमान, रहीम कहते हैं तो दूसरी ओर उसे केशव, माधव, जगदीश, हरि, गोविंद, नरहरि, राम आदि नामों से संबोधित करते हैं। कबीर के लिए यह सभी नाम एक ही है, अतः वे नाम के विवाद में नहीं पड़ना चाहते हैं। इतना वे अवश्य कहते हैं कि ‘‘मेरे राम दशरथ पुत्र राम नहीं है।‘‘ ईश्वर के जितने भी नाम हैं उनमें कबीर को राम नाम अधिक प्रिय है। कबीर दास का ब्रह्म निराकार तथा अद्वैत है। उनके अनुसार ‘‘ब्रह्म तो अद्वैत है, एक है।‘‘ जो ईश्वर को दो मानते हैं वह नरकगामी होंगे। कबीरदास ने ब्रह्म को संसार का कर्त्ता एवं ‘सृजनहार‘ कहा है। उनकी निर्गुण भक्ति अवतारवाद में विश्वास नहीं करती। इसलिए वह निर्गुण ब्रह्म को अजन्मा कहते हैं। वे कहते हैं कि ‘‘जो निर्गुण एवं निराकार है, सर्वव्यापी एवं सर्वातीत है, वह भला जन्म कैसे ले सकता है?‘‘ वह बार-बार यह कहते हैं कि ब्रह्म अनादि एवं अनंत है। वे न जन्म लेते हैं, न मृत्यु को प्राप्त होते हैं। वे अविनाशी एवं पूर्ण है।
बीज शब्दः कबीर, निर्गुण भक्ति, एकेश्वरवाद
How to cite: Kumari, R. (2026). भक्ति काव्य में निर्गुण साधनाः कबीर के संदर्भ में. Anubodhan, 2(2), 59–61. https://doi.org/10.65885/anubodhan.v2n2.2026.060